शनिवार, 3 दिसंबर 2022

बंधन मन का

 रितिका : "राधा, राधा, पहचाना मुझे" रितिका अपने कॉलेज की सहेली को देख बहुत ही खुश हुई.

राधा : "रितिका, तुम यहाँ कैसे, कैसी हो".

 रितिका: "मैं ठीक हूँ, तुम तो बिलकुल ही गायब हो गयी, माँ ने बताया की तुम्हारी शादी हो गयी, फिर उसके बाद, मैंने आंटी को अपना नंबर भी दिया, पर तुमने कभी कॉल ही नहीं किया, विदेशी पति क्या मिला तुम तो सबको भूल गई" रितिका ने हँसते हुए कहा, "चलो न मेरे घर चलो, मैं यही पास में ही रहती हूँ, माँ भी तुम्हें देख बहुत खुश होगी".

राधा : "रितिका, तुम बिलकुल भी नहीं बदली, वैसी ही हो, बोलना शुरू करती हो तो चुप ही नहीं करती". 

रितिका : "बदल तो बहुत गई हूँ, डॉक्टर हूँ, बोलना कम और सुनना ज्यादा चाहिए, पर तुम को देख, फिर वही दिन याद आ गए, खैर, चलो घर चलो, बाकी सब बाते वहीँ होंगीं".

रितिका, राधा से ज़िद्द करके उसे अपने घर, ले ही गई .

राधा : "बहुत ही सुन्दर घर है, घर तो ठीक है घरवाले कहाँ हैं ?". 

रितिका : "बस मैं और माँ हैं, हम दोनों ही रहते हैं यहाँ".

रितिका की बात पूरी हुई ही नहीं थी की रितिका की माता जी आ गई. 

रितिका : "माँ, आ गयी तुम, देखो न मुझे आज दुनिया की भीड़ में कौन मिल गया".

माँ राधा को देख कर थोड़ा सक-पका गयीं, राधा भी रितिका की माता जी को देख ज्यादा खुश नहीं हुई. 

रितिका : "अरे क्या हुआ माँ, पहचाना नहीं, राधा है ये, राधा, मेरे कॉलेज की सहेली, पता है माँ, राधा और मैंने वादा किया था की हम दोनों एक साथ ही शादी करेंगें और एक ही शहर में रहेंगें हमेशा, पर ये तो विदेशी पति पा कर, मुझे भूल ही गई".

माँ : "हाँ-हाँ ठीक है, अब चाय तो बना ला, अपनी सहेली के लिए, के बस बातें ही करती रहेगी, जा चाय बना ला". 


रितिका के जाते ही माँ, राधा के नज़दीक बैठ गई.

माँ : "तुमने उसे बताया तो नहीं, क्यों वापस आ गई हो तुम, बड़ी मुश्किल से संभली थी रितिका, अब फिर से नहीं होना चाहिए वो सब".

राधा : "माँ आपने रितिका के साथ - साथ दो ज़िंदगियाँ और खराब कर दी, न रितिका और न ही मैं, राज किसीको न मिला, और.......".

माँ : "बस-बस, मत लो उसका नाम, रितिका ने सुना तो फिर पागल हो जाएगी".

रितिका : "कौन पागल हो जायेगा माँ, किसीकी बातें कर रही हो".

माँ : "तू, तू ही तो है जो पागल है, राधा मैं इसे समझा-समझा कर पागल हो जाउगीं, पर ये न समझ सकी की शादी की उम्र निकलती जा रही है, तू ही कुछ समझा इसे".

रितिका : "माँ, शादी को कब मना किया मैंने, मैं तो बस उसका इंतज़ार कर रही हूँ, बस उसे आने दो फिर देखो, झट मांगनी, पट बियाह हो जायेगा".

राधा : "मैं चलती हूँ अब, बहुत देर हो गई है".

रितिका : "माँ मैं इसे नीचे तक छोड़ कर आती हूँ, आती रहना बहुत अच्छा लगा तुम से मिल कर, ऐसा लगा बचपन लौट आया हो".


राधा : "रीती तुम अगर बुरा न मानो तो एक बात पूछूं".

रितिका : "हाँ, हाँ, पूछो न, तुम्हारी बात का बुरा क्या मानना".

राधा : "तुम ने शादी क्यों नहीं की, और क्यों नहीं की, किस का इंतज़ार है तुमको ?".

रितिका : "राधा, तुझे याद नहीं होगा, वो हमारे ही कॉलेज में पढ़ता था, बस उसी का".

राधा : "और वो वापस न आया तो, तो क्या करोगी ?"

रितिका : "वादा तो नहीं, पर हाँ, उसने कहा था की वो अपनी माता जी को ले कर मेरे घर आएगा, और फिर पता चला वो विदेश चला गया है, बस उसी का इंतज़ार है, क्या पता किसी दिन वो आ जाये और मुझे किसी और का पा कर, उसका दिल ही न टूट जाये !".

राधा : "रितिका ऐसा करो तुम और आंटी कल हमारे यहाँ खाने पर क्यों नहीं आ जाते, मेरी माता जी भी आई हुई हैं, तुम्हें देख बहुत खुश होंगीं, आओगी न, और तुम्हें किसी से मिलवाना भी है".


रितिका ने अपनी माँ के समक्ष राधा का प्रस्ताव रखा, पर माता जी ने साफ़ मना कर दिया, "कल नहीं कभी और चलेंगें और हाँ कल तुमको मुझे डॉक्टर वो नई डॉक्टर के पास ले कर भी तो जाना है, मेरे घुटनों का दर्द बढ़ता ही जा रहा है " माता जी बात को सफाई से बात को टाल दिया.


अगले दिन रितिका माँ को नई डॉक्टर के पास ले गयी तो वहां डॉक्टर को देख हैरान रह गयी, "राधा, तुम और डॉक्टर ?".

राधा : "डॉक्टर नहीं फ़िज़ियोथेरेपिस्ट, आओ न, आईये न आंटी, यहाँ बैठ जाइये". 

रितिका : "लो माँ अपने कहा हम आपकी वजह से राधा के घर नहीं जा सकते और आपकी वजह से ही हम यहाँ आ गए, ये खूब रही, तू बता राधा ये फ़िज़ियोथेरेपिस्ट कैसे बन गयी तू ?".

राधा : "अपने पति की वजह से, शादी के एक हफ्ते बाद ही उनका बहुत भयानक एक्सीडेंट हो गया था, और वो अचल से हो गए थे, डॉक्टर ने कहा उन्हें रेगुलर फिजियोथेरेपी की ज़रुरत है, सो मैंने खुद ही फ़िज़ियोथेरेपिस्ट बनाना तय कर लिया".

रितिका : "क्या कह रही हो, कैसे हैं वो अब, ये सब मुझे क्यों नहीं पता चला, और माँ आपने कहा राधा शादी कर विलायत चली गयी है, वो सब क्या था, क्या आपको इस एक्सीडेंट के बारे में पता था क्या ?".


राधा : "आंटी ने सही कहा था, मैं चली गयी थी वहीँ सब कुछ हुआ, अब दस बरस के बाद ही हम लौटे हैं".

रितिका : "राधा, बहुत अफ़सोस हुआ ये सब जान कर, अब कहाँ है वो, और तुमने मुझे क्यों नहीं बताया ये सब, माँ तुमने भी ये सब नहीं बताया क्यों ?".

माँ : "रीती अब घर चलते हैं, चल, मुझे नहीं करवानी फिजियोथेरेपी, चल अब यहाँ से, बहुत हो गया मिलना - मिलाना ".


राधा : "आंटी, आपको नहीं लगता की दस बरस बहुत होते हैं, रितिका को अब सच जानने का पूरा हक़ है, कब तक आप रीती को सच से छुपा कर रख सकेंगीं ?".

रितिका : "ये सब क्या हो रहा है, राधा, प्लीज मुझे सब जानना है, क्या छुपा कर रखा है मुझसे आप सबने".

राधा : "आओ रीती, मेरा घर यहीं है, और अब तुम भी सब सच जान लो तो ही सही होगा".


कहते - कहते राधा रितिका दुसरे कमरे में ले गयी, उस कमरे में एक बेड था, और एक बड़ा सा टेबल था जिस पर दवाईयां पड़ी थी, "रितिका पहचाना इन्हें !" राधा ने बेड पर लेटे पेशेंट की तरफ इशारा किया. 

राज को देखते ही रितिका की आँखों में आंसू आ गए, 'दस साल से वो जिसका इंतज़ार कर रही थी, वो यहाँ, इस बेड पर सबसे बेख़ौफ़ पड़ा था, और वो इस राज का इंतज़ार में कबसे खुद से ही बेगानी सी हुई पड़ी थी, और राज, वो कैसे सबसे अनजान और खामोश सा चैन से सो रहा था  " राधा ये सब क्या है, राज तुम्हारे पास कैसे आ गया".


 राधा : "राज और उसकी माता जी तुम्हारा रिश्ता ले कर तुम्हारे घर गए थे, पर तुम्हारी माता जी ने कहा की उन्होंने तुम्हारा रिश्ता कहीं और तय कर दिया है, सो मेरी और राज की शादी का प्रस्ताव तुम्हारी माता जी ने राज की माता जी को दिया, बस फिर जल्द ही शादी हो गई, राज को लगा उसकी शादी तुमसे हो रही है, और राज मुझे, तुम्हारी जगह देख परेशान हो गया, बस फिर राज के साथ ये सब हो गया, न वो तुम्हारा हुआ और न मेरा".

माँ (रितिका की माता जी) : "रीती, मुझे माफ़ कर देगी न, मुझे नहीं पता था ये सब हो जायेगा, यकीन मनो मैंने कभी राज का बुरा नहीं चाहा था, मैं तो बस चाहती थी तुम्हारी शादी एक बड़े घर में हो, जहाँ तुम्हें दुनिया के सब सुख मिले, न की किसी ऐसे से जो अभी अपनी ज़िन्दगी को बानाने की शुरुवात कर रहा हो".

रितिका : "एक बार, बस एक बार मुझसे बात तो कर लेती, ये तूफ़ान राधा और मेरी ज़िन्दगी में नहीं आता"


तभी राज ने ऑंखें खोली और रितिका को देखते ही उसकी आँखों में एक नई सी चमक आ आ गयी, और दस साल बाद राज ने जो शब्द बोला वो था  "रीती".

रितिका ने झट से राज का हाथ थाम लिया, राधा ने भी झट-पट राज के डॉक्टर को कॉल कर दिया.


कुछ ही दिनों में राज की सेहत में बहुत सुधार आ गया, और वो अब कुछ-कुछ बात भी करने लगा, एक रोज़ राधा ने मौका देख रितिका और राज के सामने अपने मन की बात रख दी. 

राधा : "रितिका और राज अब बहुत हुआ, प्लीज अब तुम दोनों को एक साथ हो जाना चाहिए और बस शादी कर लेनी चाहिए".

रितिका : "राधा मुझे माफ़ कर दो पिछले कुछ दिनों में, मैं ये भी भूल गई थी, की तुम और राज शादी-शुदा हो, मुझे अब चलना चाहिए, राधा मुझे माफ़ कर दो, आई ऍम रियली सॉरी".

राधा : "रितिका प्लीज ऐसे मत कहो, देखो राज को इसे, तुम्हारा ही इंतज़ार था, मैंने दस बरस में भी राज को ऐसा नहीं देखा, और ये सब बातें छोड़ो, ये जो रितिका और राज है बस इस बारे में सोचो, सब भूल जाओ, क्या तुम अब राज के बिना रह लोगी !".

राज : "रीती, राधा ठीक ही कह रही है, अब प्लीज मुझे छोड़ कर मत जाओ".

रितिका : "राधा, नहीं मैं तुम्हें दुनिया की नज़र में महान नहीं बनने दूंगीं, ये सब बकवास है, और राज, तुम भी बच्चों जैसी बातें कैसे कर सकते हो ?".

राधा : "रीती, राज को भी बात समझ आ गई है, मेरा और राज का रिशत बस 'ऑन पेपर' वाला रिश्ता ही है, उससे बढ़ कर, न कभी हो सका, और न ही होगा कभी, सो दुनिया की छोड़ बस अपने बारे में सोचो, तुम दोनों ने एक दुसरे का इंतज़ार ही तो किया है पिछले दस सालों से, न तुम्हें को कोई और मिला और ना राज को कभी तुम बिन होश आया, रीती, अब तो मान जाओ अब की तुम्हारा और राज का ये बंधन, बंधन मन का बस और बस ये ही सत्य है ".

राज : " मान जाओ रीती, चाहो तो अपनी माता जी से इज़ाजत ले लो, मैं थोड़ा और इंतज़ार कर लूंगा".

रितिका, राधा के गले लग गई, "राधा तुम्हारे बिना ये सब बेकार है".

राधा : "अरे, हाँ बई, मुझे से छुटकारा नहीं मिलेगा तुम्हें, मैं यहीं आस-पास तुम्हारी अच्छी वाली सहेली ही बन कर रहूंगीं, और हाँ थैंकस राज, तुम्हारी वजह से मैं फ़िज़ियोथेरेपिस्ट बन गयी हूँ और वो भी विदेशी स्टैण्डर्ड वाली, देसी वाली नहीं".


तीनों एक दुसरे को देख मुस्कुराने लगे, रितिका और राज की  उंगलियों ने एक दुसरे को कस कर बाँध लिया और तीनों हस्ते - मुस्कुराते खिड़की से मौसम की पहली बर्फ गिरने के नज़ारों में खो गए.


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