शनिवार, 27 सितंबर 2014

आँचल .......................


याद है मुझ को बचपन का वो दिन,  
अपना आँचल अपने सर से उतार कर,
जब तूने मेरे सर पर ओढाया था, तब,
तूने ही तो कहा था मै तेरी नन्ही गुडिया हूँ,
तूने ही तो कहा था की मै फूलों सी हूँ!
फिर ..........
ये कैसे हुआ की तू मुझे अकेला छोड़ गयी,
इस दुनिया के शमशान में,
गिद्धों से भरे अनजान शहर में!
फिर ...........
ये कैसे हुआ की तू मुझे अकेला छोड़ गयी,
जानवरों से भरे जंगल के बीच में,
जहाँ से मुझे रास्ता भी ना जाता दिखाई पड़ता है!
माँ .........
मुझे मालूम है तू कभी झूठ नहीं बोल सकती,
माँ ..........
इसीलिए मै आज भी वही जंगल के बीच,
अल्ती-पालती मारे बैठी तेरा ही रास्ता निहार रही हु,
घायल हूँ, तन-मन से छलनी हूँ,
अपने ही बदन टुकड़ो को नियमित रोज़ सीती,
पर मेरी प्यारी माँ आज भी मै तेरी, नन्ही गुडिया ही हूँ,
माँ बस  इतना करना जब तू आना,
वो आँचल फिर से ले आना,
और मुझे ओढा बस आखरी बार गले लगा लेना,
माँ देर से सही पर आ जाना,
अपने आँचल में छुपा कर, बस,
मुझको अपने साथ यहाँ से जाना!


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